Ch 8: संविधान का संशोधन एवं मूल संरचना का सिद्धांत (अनुच्छेद 368)

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अध्याय 8 ⏱️ 24 min read

संविधान का संशोधन एवं मूल संरचना का सिद्धांत (अनुच्छेद 368)

अनुच्छेद 368 (भाग XX) के अंतर्गत संविधान संशोधन एवं मूल संरचना सिद्धांत का गहन विश्लेषण: संशोधन की तीन विधियाँ, प्रक्रियात्मक नियम, शंकरी प्रसाद से आई.आर. कोएल्हो तक न्यायिक संघर्ष तथा 13 न्यायाधीशों की ऐतिहासिक केशवानंद भारती पीठ।

1. संविधान संशोधन: अनुच्छेद 368 के तहत प्रक्रिया (भाग XX)

भारतीय संविधान न तो ब्रिटिश संविधान की भाँति अत्यधिक लचीला है और न ही अमेरिकी संविधान की भाँति अत्यधिक कठोर; यह लचीलेपन और कठोरता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत करता है।

  • भाग XX, अनुच्छेद 368: संसद को संविधान और उसकी व्यवस्थाओं में संशोधन करने की शक्ति तथा प्रक्रिया प्रदान करता है (यह प्रावधान दक्षिण अफ्रीका के संविधान से ग्रहण किया गया है)।
  • संविधान निर्मात्री शक्ति (Constituent Power): संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत साधारण विधायी शक्ति (विधायी प्रक्रिया) नहीं, अपितु अपनी विशिष्ट संविधान निर्मात्री शक्ति का प्रयोग करती है।

अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की चरणबद्ध प्रक्रिया

  1. विधेयक का पुरःस्थापन (Introduction): विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्य विधानमंडल में नहीं।
  2. पूर्व सहमति अनावश्यक: राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती।
  3. प्रस्तुतकर्ता: इसे किसी मंत्री अथवा गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
  4. पारित होने की शर्त: प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 बहुमत) से पारित होना अनिवार्य है।
  5. संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं: संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का कोई प्रावधान नहीं है (अनुच्छेद 108 इस पर लागू नहीं होता)।
  6. राज्यों का अनुसमर्थन (यदि संघीय ढांचा प्रभावित हो): यदि संशोधन संघीय ढांचे से संबंधित है, तो राष्ट्रपति की सहमति से पूर्व कम से कम आधे राज्यों (≥50%) के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से पारित संकल्प आवश्यक है।
  7. राष्ट्रपति की अनुमति बाध्यकारी: राष्ट्रपति विधेयक पर अनुमति देने हेतु बाध्य हैं। वे न तो अनुमति रोक सकते हैं और न ही पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं (24वें संविधान संशोधन 1971 द्वारा इसे अनिवार्य बनाया गया)।

2. संविधान संशोधन की तीन पद्धतियाँ (अनुच्छेद 368 एवं बाहर)

संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किए जा सकते हैं:

📜 संशोधन मैट्रिक्स

संविधान संशोधन की तीन पद्धतियाँ (अनुच्छेद 368 एवं बाहर)

1. संसद का साधारण बहुमत Outside Art. 368

बहुमत की शर्त: संसद के प्रत्येक सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 50% से अधिक (>50%)।

संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 4(2) व 169(3) के अनुसार यह अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन नहीं माना जाता।

  • • नए राज्यों का प्रवेश या गठन (अनुच्छेद 2 व 3)
  • • विधान परिषदों का निर्माण या समाप्ति (अनुच्छेद 169)
  • • संसद में गणपूर्ति (कोरम) व प्रक्रिया नियम
  • • संसद सदस्यों के वेतन व भत्ते
  • • राजभाषा का प्रयोग
  • • 5वीं व 6वीं अनुसूची (अनुसूचित व जनजातीय क्षेत्र)
2. संसद का विशेष बहुमत Art. 368 Clause (2)

दोहरी शर्त (Dual Test):

1. प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (>50%)।

2. उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 (≥66.6%)।

  • • मौलिक अधिकार (भाग III)
  • • राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
  • • अन्य सभी उपबंध जो श्रेणी 1 या 3 में शामिल नहीं हैं।
3. विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुसमर्थन Art. 368 Proviso
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