मौलिक अधिकार भाग-2: शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता एवं संवैधानिक उपचार (अनुच्छेद 23 से 35)
मौलिक अधिकार भाग-2 (अनुच्छेद 23 से 35) का गहन संवैधानिक विश्लेषण: शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार, अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार व 5 रिटें, सैन्य बल प्रतिबंध एवं मार्शल लॉ।
1. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 एवं 24)
भारतीय संविधान मानव की गरिमा, स्वतंत्रता तथा बच्चों के अधिकारों के संरक्षण हेतु कड़े प्रावधान करता है:
अनुच्छेद 23: मानव के दुर्व्यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध
- खंड (1): मानव का दुर्व्यापार (traffic in human beings), बेगार (बिना पारिश्रमिक के जबरन काम कराना) तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्श्रम निषिद्ध किया जाता है। इसका उल्लंघन विधि अनुसार दंडनीय अपराध है।
- लागू होना: यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को प्राप्त है, तथा यह राज्य एवं निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध प्रवर्तनीय है।
- अपवाद (खंड 2): राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों हेतु अनिवार्य सेवा (जैसे सैन्य भर्ती या समाज सेवा) अधिरोपित करने की अनुमति है, बशर्ते कि ऐसा करते समय राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा (ध्यान रहे: लिंग को अपवाद आधार में शामिल नहीं किया गया है)।
अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध
- 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने, खान या अन्य किसी परिसंकटमय (hazardous) नियोजन में काम करने हेतु नियोजित नहीं किया जाएगा।
- बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016: 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सभी व्यवसायों में नियोजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है (विद्यालय समय के बाद पारिवारिक व्यवसाय को छोड़कर)। 14 से 18 वर्ष के "किशोरों" (Adolescents) हेतु खतरनाक उद्योगों में काम पर रोक लगाई गई है।
2. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
भारत का धर्मनिरपेक्षता का मॉडल धर्म-विरोधी नहीं, अपितु सभी धर्मों को समान आदर और संरक्षण प्रदान करने वाला (सर्वधर्म समभाव) है।
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 25 से 28 का विस्तृत ढांचा
अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, आचरण व प्रचार का अधिकार
सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की पूर्ण स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने का अधिकार। **उचित प्रतिबंध:** लोक व्यवस्था, सदाचार एवं स्वास्थ्य।
धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को: 1. धार्मिक व मूर्त प्रयोजनों हेतु संस्थाएं स्थापित व पोषित करने, 2. अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने, 3. चल-अचल संपत्ति अर्जित करने, 4. ऐसी संपत्ति का विधि अनुसार प्रशासन करने का अधिकार।
धर्म संवर्धन हेतु करों के संदाय से स्वतंत्रता
राज्य किसी भी नागरिक को ऐसा कोई **कर (Tax)** देने के लिए विवश नहीं कर सकता जिसका उपयोग किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि हेतु किया जाना हो।
धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थिति से स्वतंत्रता
राज्य निधि से पूर्णतः पोषित शिक्षण संस्थानों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। अन्य मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त संस्थानों में धार्मिक शिक्षा हेतु विद्यार्थी (या अवयस्क के अभिभावक) की सहमति अनिवार्य है।
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