Ch 4: संघ और उसका राज्यक्षेत्र एवं नागरिकता (अनुच्छेद 1 से 11)

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अध्याय 4 ⏱️ 20 min read

संघ और उसका राज्यक्षेत्र एवं नागरिकता (अनुच्छेद 1 से 11)

भाग 1 (अनुच्छेद 1–4) एवं भाग 2 (अनुच्छेद 5–11) का संपूर्ण विश्लेषण। राज्यों का भाषाई पुनर्गठन, देसी रियासतों का एकीकरण, बेरुबारी फैसला, एकल नागरिकता और नागरिकता अधिनियम 1955।

1. प्रस्तावना: गणराज्य का प्रादेशिक एवं मानवीय स्वरूप

भारतीय संविधान का आरंभ दो अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभों से होता है जो नवोदित गणराज्य के मूल स्वरूप को निर्धारित करते हैं:

  1. भाग 1 (अनुच्छेद 1 से 4): प्रादेशिक ढांचा (Territorial Framework) — भारत क्या है, नए क्षेत्रों को कैसे शामिल किया जा सकता है, तथा आंतरिक राज्य सीमाओं का पुनर्गठन कैसे होता है।
  2. भाग 2 (अनुच्छेद 5 से 11): मानवीय ढांचा (Human Framework) — 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय कौन भारत का नागरिक बना, और संसद को भविष्य में नागरिकता के नियमन की पूर्ण शक्ति।

2. भाग 1: संघ और उसका राज्यक्षेत्र (अनुच्छेद 1 से 4)

अनुच्छेद 1: संघ का नाम और उसका राज्यक्षेत्र

अनुच्छेद 1(1) घोषित करता है: "भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा।"

💡 बार-बार होने वाली गलतियाँ (Exam Trap) — "राज्यों का संघ" (Union of States) बनाम "राज्यों का परिसंघ" (Federation)

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा "Union" शब्द चुनने का मूल कारण:

  1. भारतीय संघ अमेरिकी संघ की भांति राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है।
  2. किसी भी राज्य को भारतीय संघ से अलग होने (Secede) की स्वतंत्रता नहीं है। इसी कारण संविधान विशेषज्ञों ने भारत को "विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ" (Indestructible Union of destructible states) कहा है, जबकि अमेरिका "अविनाशी राज्यों का अविनाशी संघ" है।

अनुच्छेद 1(3) के अनुसार "भारत का राज्यक्षेत्र" (Territory of India) तीन श्रेणियों में विभाजित है:

  1. राज्यों के राज्यक्षेत्र (जो केंद्र के साथ संघीय शक्तियों के भागीदार हैं)।
  2. पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघ राज्यक्षेत्र (UTs) (जो राष्ट्रपति द्वारा सीधे प्रशासित होते हैं)।
  3. ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएं (उदा. गोवा, दमन व दीव, पुडुचेरी, सिक्किम)।
💡 बार-बार होने वाली गलतियाँ (Exam Trap) — "भारत का राज्यक्षेत्र" बनाम "भारत का संघ"

परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला अंतर:

  • "भारत का संघ" (Union of India): एक संकीर्ण पद है जिसमें केवल पूर्ण राज्य शामिल हैं।
  • "भारत का राज्यक्षेत्र" (Territory of India): एक अत्यंत व्यापक पद है जिसमें राज्य + केंद्र शासित प्रदेश + भविष्य में अर्जित किए जाने वाले क्षेत्र तीनों शामिल हैं।

अनुच्छेद 2: नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना

अनुच्छेद 2 संसद को शक्ति देता है कि वह ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश (Admission) या उनकी स्थापना (Establishment) कर सकेगी।

  • मुख्य बिंदु: यह केवल उन क्षेत्रों से संबंधित है जो पहले से भारत का हिस्सा नहीं हैं (बाहरी क्षेत्र)।
  • उदाहरण: सिक्किम को पहले 35वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1974 द्वारा 'सह-युक्त राज्य' (Associate State) बनाया गया, और फिर 36वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा भारतीय संघ का 22वां पूर्ण राज्य बनाया गया।

अनुच्छेद 3: नए राज्यों का निर्माण एवं वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन

अनुच्छेद 3 संसद को भारत के आंतरिक राजनीतिक मानचित्र को पुनर्गठित करने की व्यापक शक्ति देता है। संसद विधि द्वारा:

  1. किसी राज्य से उसका क्षेत्र अलग करके, या दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।
  2. किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा सकती है।
  3. किसी राज्य का क्षेत्र घटा सकती है।
  4. किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
  5. किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है (जैसे संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश 1950, मद्रास से तमिलनाडु 1969, मैसूर से कर्नाटक 1973, उड़ीसा से ओडिशा 2011)।

अनुच्छेद 3 के तहत दो अनिवार्य शर्तें:

  • शर्त 1: ऐसा कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा (सिफारिश) पर ही पेश किया जा सकता है।
  • शर्त 2: सिफारिश करने से पूर्व राष्ट्रपति उस विधेयक को संबंधित राज्य के विधानमंडल को विचार व्यक्त करने हेतु एक निश्चित समयावधि के भीतर भेजेंगे।
  • विचार बाध्यकारी नहीं: राज्य विधानमंडल के विचार राष्ट्रपति या संसद पर बाध्यकारी नहीं हैं। संसद उन विचारों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है और विधेयक को साधारण बहुमत से पारित कर सकती है।
  • केंद्र शासित प्रदेश: केंद्र शासित प्रदेशों के मामले में विधानमंडल से विचार मांगना आवश्यक नहीं है।

अनुच्छेद 4: पुनर्गठन कानूनों की संवैधानिक स्थिति

अनुच्छेद 4 स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के तहत पहली अनुसूची और चौथी अनुसूची (राज्यसभा सीटों का आवंटन) के संशोधन के लिए बनाए गए कानून:

  1. अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माने जाएंगे।
  2. ऐसे कानून संसद द्वारा साधारण विधायी प्रक्रिया के माध्यम से साधारण बहुमत (उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत) से पारित किए जा सकते हैं।
⚖️ अनुच्छेद तुलना मैट्रिक्स

भाग 1: संघ और उसका राज्यक्षेत्र (अनुच्छेद 1, 2 और 3 का तुलनात्मक विश्लेषण)

अनुच्छेद 1 परिभाषा व क्षेत्र

"भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा"

1. "राज्यों का संघ" (Union of States):

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार: (क) भारतीय संघ अमेरिकी संघ की भांति राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है, (ख) किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। भारत "विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ" है।

2. "भारत का राज्यक्षेत्र" बनाम "भारत का संघ":

भारत का राज्यक्षेत्र (Territory of India) एक व्यापक पद है जिसमें 3 श्रेणियां शामिल हैं: (1) राज्यों के राज्यक्षेत्र, (2) संघ राज्यक्षेत्र (UTs), (3) ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएं।
जबकि भारत का संघ (Union of India) में केवल पूर्ण राज्य शामिल हैं।

Indestructible Union
अनुच्छेद 2 बाहरी क्षेत्र

नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना

1. संसद की विशेष शक्ति:

संसद विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश (Admission) या उनकी स्थापना (Establishment) कर सकेगी।

2. बाहरी क्षेत्रों से संबंध (External Dimension):

अनुच्छेद 2 केवल उन क्षेत्रों से संबंधित है जो **पहले से भारत का हिस्सा नहीं हैं** (जैसे सिक्किम: 35वें संशोधन 1974 द्वारा सह-युक्त राज्य, फिर 36वें संशोधन 1975 द्वारा 22वां पूर्ण राज्य बना)।

External Admission (e.g. Sikkim)
अनुच्छेद 3 आंतरिक पुनर्गठन

नए राज्यों का निर्माण एवं वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन

1. संसद की 5-आयामी शक्ति:

संसद किसी राज्य से क्षेत्र अलग करके, दो राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है; किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा/घटा सकती है; सीमा बदल सकती है; या नाम बदल सकती है।

2. दो अनिवार्य शर्तें:

(क) विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा पर ही पेश होगा।
(ख) राष्ट्रपति विधेयक संबंधित राज्य विधानमंडल को विचार हेतु भेजेंगे (किंतु राज्य के विचार संसद पर बाध्यकारी नहीं हैं)। साधारण बहुमत से पारित होता है।

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